धूप के बीच ठहरी छाया

धूप के बीच ठहरी छाया

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सुबह की धूप आँगन में उतर तो आई थी, पर रुक नहीं पा रही थी। जैसे किसी ने उसे भीतर आने की अनुमति तो दी हो, ठहरने की नहीं। सुमेधा ने खिड़की से बाहर देखा—पीपल के पत्ते हल्के-हल्के काँप रहे थे। हवा थी, पर राहत नहीं।

घर में सब कुछ अपने-अपने स्थान पर था। अलमारी में करीने से सजी साड़ियाँ, रसोई में धुले बर्तन, और दीवार पर टँगी घड़ी—जो समय बताती थी, पर किसी का इंतज़ार नहीं करती थी।

सुमेधा ने घड़ी की ओर देखा। वही समय था, जो हर दिन होता था। लेकिन आज कुछ अलग था। शायद भीतर कहीं।

वह इस घर में तीस साल से रह रही थी। पहले बेटी बनकर, फिर बहू बनकर, और अब… बस रह रही थी। नाम के साथ जो रिश्ते जुड़े थे, वे कब ढीले पड़ गए—उसे याद नहीं। याद बस इतना था कि कभी-कभी वह खुद को अपने ही कमरे में अतिथि-सा महसूस करती थी।

दोपहर में बहू ने आवाज़ दी,
“माँजी, चाय रख दूँ?”

सुमेधा ने ‘हाँ’ कहा, पर आवाज़ इतनी हल्की थी कि खुद उसे भी सुनाई नहीं दी। चाय आई, रखी गई, और बिना किसी बातचीत के कमरे से चली गई। कप से उठती भाप कुछ देर हवा में रुकी, फिर गायब हो गई—बिलकुल उसकी बातों की तरह।

शाम को वह छत पर चली गई। आसमान में बादल नहीं थे, पर मन में अजीब-सा बोझ था। उसने सोचा—कभी तो बादल होते थे, जिनसे वह अपने मन की बात कह लेती थी। अब तो आसमान भी साफ़ है, और मन भी… ज़्यादा साफ़ होने का दबाव लिए।

उसे याद आया—कभी वह भी हँसती थी, ज़ोर से। अपनी पसंद से साड़ी चुनती थी, बिना पूछे बाहर निकल जाती थी। फिर धीरे-धीरे पूछना आदत बन गया। और एक दिन एहसास हुआ कि पूछने को भी कुछ बचा नहीं।

छत से नीचे उतरते हुए उसने आईने में खुद को देखा। चेहरा वही था, पर आँखों में कोई और था—जो बोलना चाहता था, पर शब्द ढूँढ नहीं पा रहा था।

उस रात उसने पहली बार डायरी निकाली। कोई शिकायत नहीं लिखी। कोई आरोप नहीं। बस एक वाक्य लिखा—

“मैं यहाँ हूँ, पर क्या मैं दिखती हूँ?”

कल सुबह धूप फिर आएगी। शायद रुक जाए, शायद नहीं।
पर सुमेधा ने तय किया था—अगर धूप नहीं रुकी, तो वह खुद बाहर निकल जाएगी।

क्योंकि हर छाया को किसी न किसी दिन धूप से बात करनी ही पड़ती है।

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